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साधू के तीन उपदेश

साधू के तीन उपदेश

Текст на Статията

  • एक आश्रमवासी राजकुमार को साधु के सामने लाया। राजकुमार ने साधु के चरण छूकर उन्हें प्रणाम किया। फिर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। साधु ने कहा, तुम्हारी सेवा से मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। वर माँगो। राजकुमार बोला, भगवान! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे विद्या दीजिए। साधु ने कहा, तुम्हें एक वर्ष मेरे पास रहना होगा। राजकुमार सहमत हो गया।
  • २. भगवान! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे विद्या दीजिए।
  • ३. तुम्हें एक वर्ष मेरे पास रहना होगा।
  • १. तुम्हारी सेवा से मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। वर माँगो।
  • साधु के आश्रम में रहकर विद्या पढ़ने लगा वह महिने का पाठ सप्ताह में और सप्ताह का पाठ दिन में स्मरण कर लेता था। वर्ष पूरा होने पर साधु ने कहा, बेटा, जैसे अंगारे के ऊपर राख आ जाती है, उसी प्रकार तुम्हारी बुद्धि पर परदा पडा हुआ था, जो अब हट गया है। एक ही वर्ष मैं तुम्हें पर्याप्त विद्या आ गई है। वर्ष बीत गया, तो राजकुमार ने घर जाने की आज्ञा माँगी। साधु ने कहा, बेटा कुछ माँगों। राजकुमार ने कहा, मुझे ज्ञान दिजिए।
  • २. मुझे ज्ञान दिजिए।
  • ३. बेटा तुमने कुछ नहीं माँगा और सब कुछ माँग लिया। मैं तुम्हें ज्ञान देता हूँ। तुम तीन बातें सदा ध्यान रखना। पहली, रास्ते में अकेला नहीं चलना, किसी-न-किसी को साथी बना लेना।दूसरी, किसी के दिए हुए आसन पर बिना जाँच-पड़ताल किए नहीं बैठना। तीसरी, यदि कोई अपरचित मनुष्य कुछ खाने को दे, तो पहले किसी जानवर को खिलाकर तब खाना। ज्ञान की ये बातें तुम गाँठ बाँध लो।
  • १. बेटा कुछ माँगों।
  • साधु से ज्ञान लेकर राजकुमार वहाँ से चल पड़ा।