एक बार पाँच मित्रों को पन्ना गाव में जाना था । उन्होंने कंपनी कि बस का सहारा लिया लेकिन गाव के लोग उस बस को चुड़ेल केहते थे'। व इन पांचों को भी इस बस से यात्रा न करने के लिए बोला ।
पन्ना गाव का सफर !!
लेकिन पांचों मित्रों ने बात को अनसुनी कर दी व इसे अंधविश्वास मानने लगे। जब उन्होंने बस कि व्यवस्था देखि तो उन्हे बस वयोवृद्ध लगने लगी।
अंधविश्वास को अनसुना !!
यह सब तो अंधविश्वास है ।
हा !! मित्र। गाव वाले सरफीरे हे।
लेकिन जब बस चालों हुई तो एसा प्रतीत हुआ जैसे इंजन सीट के नीचे स्थित हो। बस कि रफ्तार इतनी कम कि लोग चलकर इससे जल्दी पहुच जाते है। हर घुमाव पर एसा प्रतीत होता जैसे बस खाई में गिर जाएगी
अनसुनी बात का असर व बस कि हालत खराब !!
लगता है जैसे सीट के नीचे ही इंजन स्थित है
एसा प्रतीत हो रहा है जैसे यह मेरा आखरी दिन है
हमसे पहले तो लोग चलकर पहुच रहे है।
वह सब चिंतित हो गए व अपने आखरी के कुछ समय ही गईं रहे थे।
मृत्यु कि कगार पर !!
इस बस का तो एक टायर तक पंचर हो गया है।
"चिंता बड़े से बड़े हस्ती कि भी मृत्यु कर देता है"
उन सब ने पन्ना पहुचने कि उम्मीद छोड़ दी थी व उन्होंने काही भी जानने कि उम्मीद छोड़ दी थी। उन्होंने सब भगवान पर छोड़ दिया और चिंता का त्याग कर दिया व मस्ती से हसी मज़ाक करने लगे ।
चिंता का त्याग !!
हा !! मित्र हम वैसे भी वक्त पर पन्ना तो नहीं पहुच सकते।
दोस्तों सब भगवान के ऊपर छोड़ देते है ।
आज तो हमारा आखरी समय है । हमारी मृत्यु तय है।
हा !! चिंता करने से कुछ नहीं होगा। इस सफर का आनद लेते है।
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