एक राजा का एक लड़का था। उसका मन पढने में नहीं लगता था। सारा दिन वह घूमता-फिरता और खेलता रहता था। राजा को राजकुमार की इस प्रवृत्ति पर बहुत चिंता हुई। कई लोगों ने उपाय बताए। राजा ने वे उपाय किए भी, परंतु राजकुमार के रंग ढंग न बदले। राजा बहुत उदास रहने लगे। मंत्री के पुत्र ने राजकुमार को यह वृत्तांत सुनाया। राजकुमार बोला,"मित्र, घर पर रहकर भी क्या किसी को ज्ञान प्राप्त होता है?"
मित्र, घर पर रहकर भी क्या किसी को ज्ञान प्राप्त होता है?"
मंत्री पुत्र ने जाकर राजा को यह बात बताई। कहा,"राजकुमार बाहर जाकर ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं।" राजा इससे बहुत प्रसन्नता हुई। उन्होंने शुभ मुहूर्त में राजकुमाग को विदा किया। भ्रमण करते हुए एक घने जंगल में जा पहुंचा। वहाँ उसने देखा कि एक आश्रम है। उसमें एक साधु आँखें मूँदे बैठा है। उसके शरीर पर मिट्टी की मह चढ़ गई है। न जाने कितने समय से एक ही स्थान पर बैठा वह साधु तपस्या कर रहा था।
राजकुमार आश्रम में पहुँचा। उसने साधु के शरीर पर जमी हुई मिट्टी साफ की और हाथ जोड़कर उसे प्रणाम किया। णिर आश्रम में झाड़-बुहारकर साफ किया। रात्रि को वह आश्रम में ही सो गया। आश्रम में फल-फूलों के बहुत से पेड़ थे। राजकुमार फल - फूल खाकर वहीं रहने और साधु की सेवा करने लगा। कुछ दिन बाद साधू की तपस्या पूरी हुई। आँखें खोलने पर उन्हें अपने आस-पास का स्थान साफ दिखाई दिया आश्रम में हर वस्तु ठीक स्थान पर था। पेड़-पौधों को सींचा गया था।
सारी भूमि बड़े परिश्रम से साफ की गई थी। साधु ने कहा," जिसने मेरी इतनी सेवा की है, उसे मेरे सामने लाओ।"
जिसने मेरी इतनी सेवा की है, उसे मेरे सामने लाओ।
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