क्रिसमस से पहली शाम थी। नौ वर्षीय बालक वेनका दिनभर के काम के बाद भी, पेशे से मोची आपने मालिक आलियाखिन और उसकी पत्नी के गिरजाघर का इंतज़ार कर रहा था।
मालिक कब जायेंगे ?
मालिक के जाते ही उसने अलमारी से स्याही की दवात , घिसी निबवाला होल्डर निकाला और कागज़ को ज़मीन पर फैलाकर लिखने बैठ गया। पहला अक्षर लिखने से पहले उसने चोरों की तरह दरवाज़े और खिड़की की और विस्फारित नयनों से ताका। 'कोई नहीं है ' उसने मन ही मन सोचा और लंबी साँस लेकर अपने प्यारे दादा कांस्टेनटाइन को पत्र लिखने लगा - उसने उनको क्रिसमस की शुभकामनाएँ।
वेनका की आँखों के आगे अपने दादा कांस्टेनटाइन का चित्र स्पष्ट हो आया। छोटा-सा दुबला-पतला पैंसठ साल का वृद्ध। परिश्रम और चुस्ती से कोठी की चौकीदारी करता कांस्टेनटाइन। अत्यंत मुस्तैदी से कार्य में निमग्न, कर्मनिष्ठ।
वेनका को लगा, हो न हो, कोसों दूर बैठे उसके दादा इस समय चर्च के बाहर अपने बूढ़े साथियों से हँसी-मज़ाक कर रहे होंगे। उसने खिड़की से बाहर देखा -- रात अँधेरी थी, फिर भी घरों की सफ़ेद छतें, चाँदी - से चमकते पेड़ और बरफ़ की फुहारें उसे बहुत अच्छी लगीं। उसके मन में हलकी-सी खुशी की लहर उठी और वह फिर लिखने लगा।
मास्को बड़ा शहर है, यहाँ सब प्रतिष्ठित लोगों के घर हैं। फिर भी सब सज्जन और सौम्य नहीं। यहाँ पर किसी को भी समूह - गान में गाने की आज्ञा नहीं है। खाने को सुबह - शाम थोड़ी सी रोटी मिलती है। यहाँ मेरी उमर के बच्चे सुबह-सुबह बस्ते लटककर स्कूल जाते है......
कैसे हो ?
उसे याद आया, वह अपने दादा जी के साथ क्रिसमस पेड़ लाने जाता था। जब कभी वह बरफ़ में लुढ़क जाता तो दादा जी ठहाके लगाकर हँसते और फिर लपककर गोद में उठा लेते थे। दादा जी क्रिसमस पेड़ काटते - काटते वेनका को खूब हँसाते। सहसा कोई खरगोश वहाँ से गुज़रता तो वे चिलाते - वेनका, पकड़ो इस छोटी दुमवाले शैतान को ! , दादा जी क्रिसमस पेड़ मालिक के घर तक लाते। मालिक की लड़की और दादा जी सब पेड़ सजाने में जुट जाते।
वेनका, पकड़ो इस छोटी दुमवाले शैतान को !
वेनका ने लिखा - दादा जी, ईश्वर के लिए मुझे ले जाओ। अब और नहीं लिखा जाता। मेरा हाथ दर्द कर रहा है। अब आपका इंतज़ार है। आपका पोता। गाँव को, मेरे दादा कांस्टेनटाइन के पास। उसने पत्र को अपनी जेब में रखा और सड़क की ओर दौड़ा। वेनका ने चिट्ठी को डाक के डिब्बे में डाल दिया। घर आकर वह सो गया। उसे सपना आया चिमनी के पास खड़े उसके दादा जी अपनी साथियों को उसकी चिट्ठी पढ़कर सुना रहे हैं।
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