एक दिन, राम नाम का एक गरीब लकड़हारा नदी के किनारे पेड़ काट रहा था।
अगर मैं आज यह लकड़ी काटकर बेच सकूं तो कुछ भोजन खरीद सकता हूं।
अरे नहीं! यह कुल्हाड़ी ही एकमात्र तरीका है जिससे मैं पैसे कमा सकता हूँ। हे नदी देवता, कृपया मेरी कुल्हाड़ी लौटा दो
अंततः देवी नाम की एक देवी हाथ में कुल्हाड़ी लिए जल से प्रकट हुईं।
नहीं, यह मेरी कुल्हाड़ी नहीं है। मेरी तो साधारण लकड़ी की कुल्हाड़ी है।
हाँ देवी! यह मेरी कुल्हाड़ी है। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, मैं आपका सदैव ऋणी रहूँगा।
प्रिय रामू, क्या यह चांदी की कुल्हाड़ी तुम्हारी कुल्हाड़ी है?
प्रिय राम, क्या यह बहुमूल्य चांदी की कुल्हाड़ी आपकी है?
प्रिय राम, क्या यह लकड़ी की कुल्हाड़ी आपकी कुल्हाड़ी है?
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अचानक, राम की कुल्हाड़ी नदी में गिर जाती है। राम व्याकुल हो जाता है और प्रार्थना करने लगता है
अंत में देवी ने समुद्र से राम का फरसा निकाला और उन्हें अर्पित कर दिया।
देवी उसकी ईमानदारी से प्रभावित हुईं और उसे पुरस्कृत किया।
कहानी की नीति:ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है
धन्यवाद देवी, मैं आपके शब्द सदैव याद रखूंगा।
चांदी की कुल्हाड़ी
रामू, तुम्हारी ईमानदारी के लिए मैं तुम्हें चाँदी की कुल्हाड़ी और तुम्हारी अपनी कुल्हाड़ी इनाम में देता हूँ। अलविदा रामू, और याद रखना, हमेशा ईमानदार रहना।
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